Wednesday, June 30, 2010

दस्त-ऐ-ज़मील-ऐ-तरबखेज मेरी माँ के थे
उन हरेक पल वो साथ जो मेरे इम्तहाँ के थे

हरेक सिम्त समेत दी कि हो जाऊं कामरां
वगरना कल तक सब कहाँ के हम कहाँ के थे

अहल-ऐ-जहां ओ ये पेंच-ओ-ख़म का दम
मुझे गिराने वाले सब मेरे ही कारवां के थे

जब तक वो न थी करीब,तो सब थे रकीब
हम तब तक उम्मीदवार खुर-ऐ-गलताँ के थे

आज तो दे रखीं हैं सौ दुकाने किराए पर
कल तक खरीदार खुद हम अपनी दुकाँ के थे


दस्त-ऐ-ज़मील-ऐ-तरब्खेज़--खुशियाँदेने वाले कोमल हाँथ
सिम्त--दिशा
अहल-ऐ-जहां--दुनियावाले
कामरां--सफल
पेंच-ओ-ख़म--दाओ-पेंच
कारवां--जुलूस
खुर-ऐ-गलताँ--डूबता सूरज

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